दंगे से हर शख्स घबराता है चाहे वह बंगाली हो या मारवाड़ी या फिर मुसलमान

कलाम साहब बहुत ऊँची चीज़ थे। उनको राष्ट्रपति पद, उनका देश के प्रति समर्पण, देश की सेवा के लिए दिया गया था। राजनीती से तो उनका दूर का सम्पर्क भी नहीं था। पर अंसारी साहब एक उम्रदराज, दो बार उपराष्ट्रपति रह चुके तजुर्बेदार, उच्चशिक्षित, कई विश्वविद्यालयों के कुलपति/उपकुलपति रह चुके और यहाँ तक की विदेश में भारत के राजदूत रह चुके हैं और यह कोई गुनाह नहीं है की वे एक प्रगतिशील मुसलमान भी हैं । उप राष्ट्रपति पद पर रहते हुए बहुत पहले 'यह' बात कहना की "मुसलमानों में असुरक्षा की भावना पनप रही है",  कई प्रकार के वितर्क को जन्म देता। इसलिए उन्होंने विदाई की बेला में मन की बात कह दी जो की एकदम सही है और समयानुकूल भी। वैसे यह सच है की देश के मुसलमान एक हद तक घबराये हुए है।

दो दशक पहले ओडिशा में मारवाड़ीयों पर जुल्म किया गया। उनमेसे डर कर बहुत से ओडिशा छोड़ गये। क्या ये लोग उस समय काल में घबराये हुए नहीं थे करीब छह दशक पहले असम में 'बंगाली भगाओआंदोलन हुवा था। बहुत सारे बंगाली असम छोड़ कर बंगाल या त्रिपुरा आ बसे। क्या उस समय काल में असम के बंगाली घबराये हुए नहीं थे। ULFA के आंदोलन के चरम काल में असम में मारवाड़ीयों पर जुल्म नहीं हुवा क्या उस समय काल में मारवाड़ी त्रस्त नहीं थे। जिस पर गुजरती है वही जानता। दूसरे तो सिर्फ राजनीती की रोटी सेकतें हैं।

मैं प्रणाम करता हूँ बंगाल की जनता का जिन्होंने सभी धर्मों से ऊपर उठ कर राज धर्म का पालन कर भारत में एक मिसाल पैदा की और देश के बंटवारे के दौरान साम्प्रदायिकता से सबसे ज्यादा क्षतिग्रस्त होने पर भी बंगाल में साम्प्रदायिकता को पनपने नहीं दिया।

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