बच्चों का जन्मदिन मनायें दीप जलाकर, मोमबत्ती बुझाकर नहीं

भारतीय संस्कृति में राजे-रजवाड़ों के महलों को छोड़ कर बच्चों के जन्मदिन मनाने का रिवाज़ नहीं था। पर समय बदला और स्वाधीनता के बाद से धीरे धीरे पश्चिमी सभ्यता का अनुकरण कर बच्चों के जन्मदिन मनाये जाने लगे। अब तो हर घर में बच्चों के जन्मदिन मनाये जातें हैं  जो कि बदलती संस्कृति के अनुसार समयानुकूल भी है और उचित भी है क्यों की इससे बच्चों में आत्मसन्मान की भावना जागृत होती एवं व उनका आत्मविस्वास भी बढ़ता है।

पर बच्चों के जन्मदिन मनाने में पश्चिमी  अंधानुकरण न कर भारतीय संस्कृति के अनुसार और भी सुन्दर ढंग से मनाया जा सकता है। ऐसा मेरे अपने घर पर वर्षों से किया जा रहा है और इसे सभी ने सराहा है। दीपक का  भारतीय संस्कृति में एक अहम् स्थान है।  हमारे यहाँ  कोई भी शुभकार्य में  दीपक प्रज्वलित किये जाते हैं  चाहे वह दिवाली हो, गृहप्रवेश हो या फिर घर में कोई पूजा हो। भगवान् राम के अयोध्या लौटने पर पूरी अयोध्या नगरी दीयों से सजाई गई थी। हम भी अपने बच्चों के जन्मदिन पर दीपक प्रज्वलित कर जन्मदिन भारतीय सांस्कृतिक वातावरण में मना  सकतें हैं ।
दीपक प्रज्वलित कर जन्मदिन मनाने की विधि:
इस विधि के अनुसार नव वर्ष प्रवेश के लिये  एक बड़ा दीपक मध्य में रखकर अबतक पूर्ण हुई आयुके प्रतिवर्ष  के लिये एक एक छोटा दिया बड़े दीये के चारों गोलाई में सजायें I इन दीयों के नीचे सुगन्धित फूलों की पंखुड़ियां बिछायें ताकि सजावट में चार चाँद लग जाये।घर की सजावट बैलून से और  अन्य सामग्रियों जैसे करते आएं हैं वैसे ही कर सकते हैं।                                                    
एक सजी हुई थाली के बीच में केक के आकार की कलाकंद/दिल कुशार/काजू  या इसी प्रकार की कोई भी मिठाई रख कर  हैप्पी बर्थ डे के गान व तालियों की गड़गड़ाहट  के साथ काट कर बांटा जा सकता है। अगर एक बार में इतना परिवर्तन न चाहें तो फ्रूट केक भी काट सकतें है। पहला बड़ा दीया, जिसका जन्मदिन हो उस बच्चे से ( अगर वह बच्चा बहुत छोटा न हो तो) प्रज्वलित करवायें। बाकि दीये घर के दूसरे सदस्यों से या फिर आये  हुए अतिथियों से मिल-जुल कर प्रज्वलित किये जा सकतें हैं। हिन्दू संस्कृति के अनुसार उपस्थित सभी को मस्तक पर टिका भी लगायें । मिठाई का पहला टुकड़ा माता-पिता या दादा-दादी बच्चे के मुँह में डालें और उपस्थित सभी, बच्चे पर फूल की पंखुडिओं की वर्षा कर आशीर्वाद प्रदान करें। जन्मदिन का कार्यक्रम समाप्त होने पर सारे छोटे दीये  सावधानी से घर के अलग अलग जगह भी रखे जा सकते है जैसा की  दीपावली में किया जाता है I
दीये प्रज्वलित करने और मोमबत्ती बुझाने में क्या फर्क है ?

 दीपक जीवनरूपी रोशनी का स्वरुप है जो हमें भगवान सूर्य से मिलती है और जिसके बिना हमारा अस्तित्व ही नहीं रह सकता। अतः दीपक प्रज्वलित करना जीवन को रौशनी प्रदान करना है जिससे बच्चे का जीवन रोशन हो। भावना यह है की बड़ा दीया नए बर्ष को  रोशन करता है और छोटे दीये बीते वर्षों से प्राप्त ज्ञान स्वरुप है जिसके आलोक में वर्तमान और भी समृद्ध बनता जाता है। हिन्दुओं में दीपक बुझानेकी परिपाटी नहीं है और दीपक अपना जीवन काल (चाहे वह घंटे दो घंटे का ही क्यों न हो) समाप्त होने पर अपने आप  बुझता हैI दीपवली पर  तो हम रातभर दिए प्रज्वलित रखते हैं   बल्कि समय से पहले दीपक का बुझना अपशकुन माना  जाता है, फूंक मरकर बुझाना तो दूर की  बात है।


दूसरी तरफ मोमबत्ती बुझाकर हम क्या साबित करना चाहते है की हमें जीवन में रौशनी की जरुरत ही नहीं है या फिर बीते समय में जो तजुर्बा हुवा  और जो रौशनी मिली उसकी  वर्तमान या भविष्य काल में कोई अहमियत नहीं है I पश्चिम में तो मृत ब्यक्ति के कब्र पर बर्षौदी  के दिन मोमबत्ती जलाकर रखी जाती है जबकि जन्मदिन के शुभ अवसर पर मोमबत्ती बुझाई जाती है।  वैसे ये उनका सांस्कृतिक तरीका है जिससे हमें या आपको कोई शिकायत होने की गुंजाइश नहीं है । भारतीय सांस्कृतिक संदर्भ में जन्मदिन में मोमबत्ती बुझाना क्या अपशगुन नहीं है ? हमने विदेशियों से जन्मदिन मनाना सीखा पर सारी  चीजें उनका नक़ल करना कहाँ तक उचित है। हम अपनी संस्कृति को क्या पूरी तरह छोड़ दें जबकि अधिकतर  मामलोंमें हमारे सांस्कृतिक मानदंड विदेशियों से कहीं बेहतर हैं। तो आइये अबसे शुरू करें भारतीय तरीके से बच्चों का जन्मदिन पालन करना I

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